कर्नाटक हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में उस 21 वर्षीय सिख युवती की जबरन मानसिक जांच कराने से साफ इनकार कर दिया है, जो अपनी मर्जी से अपने मुस्लिम प्रेमी के साथ रह रही है। मंगलवार को अदालत ने युवती की मां द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब कोई बालिग महिला अपनी स्वतंत्र इच्छा से किसी के साथ रहने का फैसला करती है, तो बिना उसकी सहमति के उसे मानसिक जांच के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
"मुझे डरा-धमका कर झूठी चिट्ठी लिखवाई गई"
सुनवाई के दौरान अदालत के सामने युवती ने कई चौंकाने वाले खुलासे किए। उसने बताया कि पहले भी उसके माता-पिता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के कुछ सदस्यों ने उस पर दबाव डालकर उसके प्रेमी के खिलाफ दुष्कर्म और जबरन धर्म परिवर्तन के झूठे आरोप लगवाए थे।
युवती ने कोर्ट को बताया, "मैंने जो चिट्ठी लिखी थी, वह दबाव में लिखी गई थी। मेरे माता-पिता ने मुझे आरएसएस के लोगों से मिलवाया और मुझसे वह पत्र लिखवाया। न तो मेरा धर्म परिवर्तन हुआ है और न ही रेप, यह सब झूठ है। उन्होंने मुझे धमकी देकर यह सब करवाया था।"
निमहंस (NIMHANS) की रिपोर्ट और मां की दलीलें
याचिकाकर्ता (मां) की ओर से पेश वकील राहुल रेड्डी ने कोर्ट में दलील दी कि युवती का पहले भी नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेज (NIMHANS) में मनोवैज्ञानिक इलाज और थेरेपी चल चुकी है। वकील ने डिस्चार्ज समरी और मेडिकल रिकॉर्ड का हवाला देते हुए एक स्वतंत्र मानसिक मूल्यांकन की मांग की। उनका तर्क था कि इससे यह पता चल सकेगा कि युवती द्वारा प्रेमी के साथ रहने का फैसला पूरी तरह से 'सोच-समझकर' लिया गया है या नहीं। इसके अलावा, वकील ने अदालत का ध्यान युवती के उन पुराने पत्रों की ओर भी दिलाया जिनमें उसने अपनी जान को खतरा होने और जबरन धर्मांतरण की बात कही थी।
"मुझे पागल साबित करने की कोशिश हो रही है"
मां के सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए युवती ने कोर्ट में कहा कि उसे पागल साबित करने की झूठी कोशिशें की जा रही हैं। वह अपने माता-पिता के साथ वापस जाने को तैयार नहीं हुई। युवती ने अपनी बात मजबूती से रखते हुए कहा, "निमहंस में भर्ती कराकर मुझ पर जो आरोप लगाए जा रहे हैं कि मैं पागल हूं, वे पूरी तरह से फर्जी हैं। मैं मानसिक रूप से बिल्कुल स्थिर हूं और मुझे समझ नहीं आ रहा कि वे मुझे इस तरह परेशान क्यों कर रहे हैं।"
हाईकोर्ट ने फैसले में क्या कहा?
जस्टिस सूरज गोविंदराज और जस्टिस के. मन्मथ राव की वेकेशन बेंच ने युवती के बयानों में उसके आत्मविश्वास को देखते हुए मां के दावों को खारिज कर दिया। पीठ ने कहा, "केवल इसलिए कि आप मांग कर रहे हैं, किसी को मानसिक जांच से क्यों गुजरना चाहिए? आप केवल 'मेंटल हेल्थकेयर एक्ट' के तहत आवेदन कर सकते हैं और उस प्रक्रिया का पालन कर सकते हैं। इसके अलावा हम इस तरह जबरन कोई आदेश नहीं दे सकते।
कोर्ट ने अपने आदेश में साफ किया कि युवती बालिग है और उसने स्पष्ट रूप से कहा है कि वह अपनी मर्जी से अपने प्रेमी के साथ रह रही है और उसे किसी ने बंधक नहीं बनाया है। अदालत ने कहा कि ऐसे में इस याचिका का कोई ठोस आधार नहीं बनता, और इसी के साथ मां की याचिका खारिज कर दी गई।
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